धान उठाव में देरी से बढ़ा जीरो शॉर्टेज विवाद, समितियों पर आर्थिक बोझ

दुर्ग (छत्तीसगढ़)। दुर्ग जिले में धान खरीदी प्रक्रिया पूर्ण हुए लगभग चार से पांच माह बीत चुके हैं, लेकिन समय पर धान का उठाव नहीं होने का खामियाजा अब सेवा सहकारी समितियों के अध्यक्षों और प्रबंधकों को भुगतना पड़ रहा है। जिले में जीरो शॉर्टेज का मुद्दा लगातार गरमाता जा रहा है।
धान खरीदी के बाद बड़ी मात्रा में धान लंबे समय तक यार्डों में पड़ा रहा। भीषण गर्मी और लू के कारण धान की नमी कम हुई और वजन में स्वाभाविक गिरावट आई। अब इसी वेट लॉस को शॉर्टेज के रूप में दर्ज किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं। परिणामस्वरूप अनेक समितियों में जीरो शॉर्टेज की स्थिति निर्मित हो गई है और इसकी आर्थिक जिम्मेदारी प्रबंधकों एवं अध्यक्षों पर डाली जा रही है।


कुछ समितियों का उठाव तेज, कुछ की फाइलें लंबित
जिले में चर्चा का विषय यह भी है कि कुछ समितियों का धान बेहद तेजी से उठ गया, जबकि कई समितियों की फाइलें आज भी लंबित हैं। इससे उठाव प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
“सेटिंग रेट” की चर्चाएं
समिति प्रबंधकों का आरोप है कि शॉर्टेज की भरपाई के लिए धान जमा कराने या नकद भुगतान करने का दबाव बनाया जा रहा है। चर्चाओं के अनुसार, धान के बदले 2100 से 2200 रुपये प्रति क्विंटल तक के कथित “सेटिंग रेट” की बात सामने आ रही है। प्रबंधकों का कहना है कि यदि समय पर उठाव किया गया होता तो ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
DO जारी करने की प्रक्रिया पर भी सवाल
समितियों के बीच यह चर्चा है कि डिलीवरी ऑर्डर (DO) जारी करने की प्रक्रिया निर्धारित टोकन तिथि के अनुरूप नहीं चल रही है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि जिन समितियों का कार्य प्राथमिकता से किया गया, उनका माल समय पर उठ गया, जबकि अन्य समितियां अब भी प्रतीक्षा कर रही हैं।
उठ रहे हैं महत्वपूर्ण सवाल
1. यदि खरीदी के 30 दिनों के भीतर धान का उठाव नहीं हुआ, तो वेट लॉस की जिम्मेदारी किसकी होगी?
2. क्या धान के बदले नकद सेटलमेंट की कोई व्यवस्था न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के नियमों में है?
3. क्या DO जारी करने की प्रक्रिया पूरी तरह स्वचालित और पारदर्शी है या उसमें मानवीय हस्तक्षेप की गुंजाइश है?
4. कट्टा एवं स्टॉक मिलान जैसी प्रक्रियाएं पारदर्शी निगरानी और CCTV व्यवस्था के तहत होंगी या नहीं?
समितियों से जुड़े पदाधिकारियों का कहना है कि इन सवालों के स्पष्ट उत्तर मिलने से ही किसानों, समितियों और प्रशासन के बीच विश्वास कायम रह सकेगा। वहीं अब संबंधित मुद्दों की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग भी तेज होती जा रही है।






