परसुली में किसानों को असली-नकली कीटनाशकों की पहचान एवं सुरक्षित कीटनाशक उपयोग का दिया गया प्रशिक्षण
धमधा। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के वनस्पति संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय के अंतर्गत केंद्रीय एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन केंद्र , रायपुर एवं कृषि विभाग, धमधा (जिला दुर्ग) के संयुक्त तत्वावधान में खरीफ 2026-27 के अंतर्गत आज ग्राम परसुली, विकासखंड धमधा, जिला दुर्ग में “असली एवं नकली कीटनाशकों की पहचान तथा कीटनाशकों के सुरक्षित, वैज्ञानिक एवं विवेकपूर्ण उपयोग” विषय पर एक दिवसीय किसान जागरूकता कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम में लगभग 50 किसानों ने भाग लिया, जिनमें प्रगतिशील किसान, महिला किसान, किसान मित्र तथा कृषि विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारी शामिल रहे। कार्यक्रम का संचालन एवं मार्गदर्शन डॉ. रीता प्रभाकरराव सिंगारे, वनस्पति संरक्षण अधिकारी एवं प्रभारी, सी.आई.पी.एम.सी रायपुर, डॉ. आशीष जायसवाल एवं श्री वरुणेश कुमार, सहायक वनस्पति संरक्षण अधिकारी, सुश्री सुखी मंडी , सहायक वनस्पति संरक्षण अधिकारी तथा श्री युगांत बघेल, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी, धमधा द्वारा किया गया।
प्रशिक्षण के दौरान डॉ. रीता प्रभाकरराव सिंगारे ने किसानों को असली एवं नकली कीटनाशकों की पहचान के सरल तरीके बताते हुए अधिकृत विक्रेता से ही कीटनाशक खरीदने, पैकेट पर पंजीकरण संख्या, बैच नंबर, निर्माण एवं समाप्ति तिथि, निर्माता का नाम तथा लेबल की जांच करने और प्रत्येक खरीद पर पक्का बिल लेने की सलाह दी। डॉ. आशीष जायसवाल ने कीटनाशकों के सुरक्षित, वैज्ञानिक एवं विवेकपूर्ण उपयोग, आर्थिक क्षति स्तर (ETL) के आधार पर अनुशंसित मात्रा में दवा के प्रयोग, एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) तथा बीजोपचार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इससे बीज जनित रोगों की रोकथाम, बेहतर अंकुरण, स्वस्थ पौध और अधिक उत्पादन प्राप्त होता है।



श्री वरुणेश कुमार ने किसानों को रासायनिक कीटनाशकों के विकल्प के रूप में जैविक एवं अन्य आईपीएम उपायों की जानकारी दी तथा फेरोमोन प्रपंच, चिपचिपे प्रपंच और जैव नियंत्रण कारकों के उपयोग पर चर्चा की। वहीं सुश्री सुखी मंडी ने एन.पी.एस.एस. (NPSS) मोबाइल एप के उपयोग, कीटनाशकों के सुरक्षित एवं संतुलित प्रयोग तथा छिड़काव के दौरान अपनाई जाने वाली आवश्यक सावधानियों की जानकारी दी। उन्होंने किसानों से आईपीएम तकनीकों को अपनाकर रसायनों पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया।
कार्यक्रम के अंत में किसानों ने विशेषज्ञों से अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया और विश्वास व्यक्त किया कि वे प्रशिक्षण में प्राप्त तकनीकों को अपनाकर सुरक्षित, वैज्ञानिक एवं पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देंगे तथा फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में वृद्धि करेंगे।



