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एस.आई.आर. सत्यापन के चक्रव्यूह से वयोवृद्ध प्रोफेसर परेशान

विशेषज्ञ मत: गंभीर चिकित्सकीय स्थिति में 'सघन मानवीय निगरानी' ही एकमात्र सुरक्षा कवच।  नीतिगत मांग: 75+ आयु वर्ग के गंभीर मरीजों हेतु 'किसी भी प्रशासनिक कार्य' के लिए 'डोरस्टेप' या 'डिजिटल' माध्यम को मिले कानूनी मान्यता।

कुम्हारी। वार्ड क्रमांक 15, कुम्हारी (पाटन) के 88 वर्षीय सेवानिवृत्त प्रोफेसर यज्ञ व्रत श्रीवास्तव, जो विगत चार वर्षों से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं, उनके भौतिक सत्यापन हेतु जारी एस.आई.आर. नोटिस ने प्रशासनिक नियमों की व्यवहारिकता पर प्रश्नचिह्न लगा है। स्थानीय पार्षद अनुराग गुप्ता ने अपनी ओर से समाधान के लिए प्रयास भी किया था, फिर भी दिनांक 7 फरवरी 2026 को बीएलओ का घर पर पहुंचकर औपचारिकताओं के लिए विवश करना, एक बड़ी नीतिगत खामी की ओर ध्यान खींचती है।

मेडिकल प्रोटोकॉल: ‘सघन मानवीय निगरानी’ ही एकमात्र सुरक्षा कवच
मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रोफेसर श्रीवास्तव हार्ट फेलियर, क्रोनिक किडनी डिजीज (सी.के.डी.) और ह्रदय रोग जैसी मल्टी-ऑर्गन बीमारियों से पीड़ित हैं। । निरंतर दवाओं के सेवन के कारण शरीर में इलेक्ट्रोलाइट डिसबैलेंस बिगड़ने का खतरा हर पल बना रहता है, जिसकी वजह से सतत मानवीय निगरानी अनिवार्य है। साथ ही गंभीर उम्र सम्बन्धी बीमारियों के कारण डॉक्टरों ने स्पष्ट रूप से ‘मॉनिटरिंग वाइटल्स’ का निर्देश दिया है। विशेषज्ञों के आकलन के अनुसार, ऐसी जटिल बीमारी की स्थितियों में मृत्यु का जोखिम चिकित्सकीय रूप से अत्यंत अधिक माना जाता है; इसलिए देखरेख की व्यवस्था में किसी भी प्रकार की मानवीय चूक, अनुभवी प्राथमिक केयर टेकर की अनुपस्थिति या मॉनिटरिंग में लम्बा अंतराल मरीज के जीवन के लिए घातक सिद्ध हो सकता है, , क्योंकि आपात स्थिति में समय रहते उपचार की व्यवस्था ही रोगी की सुरक्षा का प्रमुख आधार होती है।

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साँसों पर पहरा: रात भर ‘वाइटल्स’ की निगरानी
बेटे शील रत्न श्रीवास्तव ने बताया कि विगत चार वर्षों से बीमार पिता की निरंतर सुरक्षा अखंड चिकित्सकीय अनुशासन, ‘कठोर मेडिकल प्रोटोकॉल’ और ‘सतत सघन मानवीय देखभाल ‘ पर टिकी है। शुगर लेवल का अचानक गिरना (हाइपोग्लाइसीमिया), इलेक्ट्रोलाइट्स में बदलाव, यूरिन आउटपुट, पल्स रेट, रक्तचाप और ऑक्सीजन के स्तर में असाधारण बदलाव आने का जोखिम हर पल बना रहता है, जिसके कारण अक्सर पूरी रात जागकर देखरेख करनी पड़ती है। घर को ही एक ‘सघन मानवीय देखभाल कक्ष’ के रूप में तब्दील कर सारे वाइटल्स पैरामीटर्स पर नजर रखना ही इस सुरक्षा कवच का आधार है। चिकित्सकीय विवशता के कारण, बेटे ने पूर्व में मरीज को गैर-अनुभवी अटेंडेंट के भरोसे अकेला छोड़कर दफ्तर पहुँचने में अपनी व्यावहारिक असमर्थता व्यक्त की थी।

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प्रशासनिक संवेदनशीलता की दरकार: नीतिगत सुझाव
इस प्रकरण के माध्यम से बुद्धिजीवियों ने शासन के समक्ष निम्नलिखित सुझाव रखे हैं:
1. प्रशासनिक कार्यों का सरलीकरण: 75+ आयु वर्ग के गंभीर मरीजों के लिए किसी भी प्रशासनिक कार्यो में भौतिक उपस्थिति की बाध्यता कानूनी रूप से समाप्त हो।
2. डिजिटल और डोरस्टेप विकल्प: वीडियो कॉल के माध्यम से ‘वर्चुअल सत्यापन’ को मानक संचालन प्रक्रिया बनाया जाए।
3. प्राथमिकता का अधिकार: अटेंडेंट को सरकारी दफ्तरों में ‘प्राथमिकता’ मिले ताकि वह जल्द वापस लौटकर मरीज की सुरक्षा संभाल सके।
साहित्यकार सुरेश वाहने ने कहा कि “नियम नागरिकों की सुविधा के लिए हैं, उन्हें नियमों की वेदी पर बलि नहीं चढ़ाया जा सकता।”

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