खेत खलियान से प्रतिबंधित अर्जुन पेड़ की कटाई, पर्यावरण संरक्षण में शासन के साथ नागरिकों की भी जिम्मेदारी

पाटन, अम्लेश्वर। “पर्यावरण को दूषित होने से बचाना है, हमें चारों तरफ पेड़ लगाना है” — यह संदेश आज केवल नारों और फोटो सेशन तक सीमित होता दिखाई दे रहा है। शासन के निर्देशानुसार “एक पेड़ मां के नाम” अभियान के तहत जनप्रतिनिधि और अधिकारी पौधारोपण तो कर रहे हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा और देखभाल के लिए पुख्ता इंतजाम नहीं किए जा रहे हैं।
वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि सिर्फ पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी सुरक्षा और संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। इस मामले में शासन-प्रशासन जितना जिम्मेदार है, उतनी ही जिम्मेदारी आम नागरिकों की भी है। लोग अपने आसपास पौधे तो लगा रहे हैं, लेकिन उनकी नियमित देखभाल और सुरक्षा की ओर गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं।



लगातार पेड़ों की कटाई हो रही है, विशेषकर प्रतिबंधित अर्जुन वृक्ष की अवैध कटाई चिंता का विषय बनी हुई है। खेत-खलिहानों में कभी बड़ी संख्या में दिखाई देने वाले अर्जुन के पेड़ अब तेजी से गायब होते जा रहे हैं। सवाल यह है कि प्रतिबंध के बावजूद इन पेड़ों की कटाई और बिक्री कैसे हो रही है? दो-चार हजार रुपये के लालच में लोग पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने से भी नहीं हिचक रहे हैं।
राजस्व और वन विभाग पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि समाज को आत्ममंथन करने की जरूरत है। पहले के समय में किसान पेड़ों को काटने के बजाय उनकी टहनियों का उपयोग करते थे और पेड़ सुरक्षित रहते थे। आज स्थिति इसके विपरीत है — लोग स्वयं अपने पेड़ों को बेच रहे हैं और फिर दोष शासन-प्रशासन पर मढ़ देते हैं।
इसी लापरवाही का परिणाम है कि तापमान 44-45 डिग्री तक पहुंच चुका है। भीषण गर्मी से जनजीवन प्रभावित है। पशु-पक्षी भीषण ताप से बेहाल हैं और कई पक्षियों की असमय मृत्यु हो रही है। यदि समय रहते पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में मानव जीवन भी गंभीर संकट में पड़ सकता है।
आइए, केवल फोटोबाजी तक सीमित न रहें। अपने आसपास अधिक से अधिक पेड़ लगाएं, उनकी सुरक्षा करें और पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाएं। शासन-प्रशासन को दोष देने के बजाय अपनी जिम्मेदारी निभाएं और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित भविष्य सुनिश्चित करें।
– पत्रकार करन साहू की कलम से



